जयपुर से 70 किलोमीटर दूर पर्यटन और धार्मिक नगरी सांभरलेक फाल्गुन माह में होली के रंगों के साथ-साथ वर्षों से चली आ रही परंपराओं के रंग में डूब जाती है. यहां नन्दकेश्वर का विशाल मेला आयोजित किया जाता है. यह परंपरा चौहान वंश के राजा गोगराज के समय से चली आ रही है. पिछले 1700 सालों से लोग इसे निभा रहे हैं. इसे देखने के लिए प्रवासी लोगों के साथ-साथ देसी विदेशी पर्यटक भी यहां पहुंचते हैं और होली के रंग में सराबोर हो जाते हैं.
होली का जुनून यहां के लोगों के सिर इस कदर चढ़कर बोलता है कि बाहर रहने वाले लोग चाहे अन्य किसी पर्व पर यहां आए या ना आए लेकिन होली के पर्व पर कभी आना नहीं भूलते. रात को गलियों में अलग अलग लोगों की टुकड़ियां ढोल व चंग की थाप पर लावणियां गाते हुए दिखाई देती है. धूलंडी के दिन भगवान नन्दकेश्वर की सवारी पूरे हर्षोल्लास के साथ निकाली जाती है. यहां नंदी पर सवार भगवान शिव की सवारी निकलती है. हजारों झूमते गाते लोगों के बीच ऐसा लगता है मानो स्वयं भगवान शिव नंदी पर सवार होकर यहां आए हो. अखाड़ा सदस्य हिमांशु व्यास ने बताया कि यह सवारी शिव विवाह का चित्रण करती है.
सांभरलेक की होली अलग ही समां बांधती है. जब मनोरंजन के साधन कम होते थे, उस जमाने में होली पर ऐतिहासिक और धार्मिक कथाओं पर आधारित नाटक तमाशे मनोरंजन का जरिया होते थे, जिससे यहां के लोग उल्लास और कला की अभिव्यक्ति करते थे. यह परंपरा आज भी होली पर जन जीवन में उल्लास भरती है. भले जमाना टीवी का हो या सोशल मीडिया का. यहां संस्कृति और परंपराओं बखूभी रमते हुए लोग अपना मनोरंजन करते हैं, जिसे देखने के लिए युवा पुरुष या महिला बच्चे सभी देर रात तक डटे रहते हैं.